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गिफ्ट का चक्कर

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गिफ्ट  का चक्कर किस्सा न 1. सलोनी नाराज है. शुभम समझ ही नहीं पा रहा है की आखिर माजरा क्या है? अभी थोड़ी देर पहले ही वो दोनों केंडल लाइट डिनर लेकर लौटे है. बेहद खुशनुमा शाम थी. सलोनी का जन्मदिन मनाने के लिए शुभम ने पांच सितारा होटल में टेबल बुक किया था. जब केक काटा तब स्पेसिअल्ली ऑर्केस्ट्रा से निवेदन करके सोंग्स बजवाये. समझ नहीं आ रहा कहा गलती हुई. घर आकर शुभम ने सलोनी की आँखों पर पट्टी बाँधी और बेहद रोमांटिक माहौल में उसका गिफ्ट खुलवाया..मगर ये क्या ? जब सलोनी ने आँखों से पट्टी खोली तो पाया के उसके लिए शुभम ने एक क्रूजर बाइक खरीदी थी. चमचमाता लाल कलर, 500 CC का इंजन . किस्सा न 2. श्वेताभ १० वर्षीय कक्षा ५ में पढने वाला बच्चा है. हर बार उसका जन्मदिन वैसे ही घर पर मना लिया जाता था. इस बार उसकी जिद थी के उसका जन्मदिन बड़े पैमाने पर गार्डन में मनाया जाए. थक हार कर पिता ने एक होटल बुक किया और रिश्तेदारों सहित कई दोस्तों/ जानकारों को निमंत्रित किया. केक काटने के बाद गिफ्ट मिलने का सिलसिला शुरू हुआ. श्वेताभ ढेर सारे गिफ्ट पेकेट पाकर खुश हुआ था. घर जाकर सबसे पहले उसने गिफ्ट खोलने का...

नया साल नया माल- रावडी राठोड

नया साल नया माल- रावडी राठोड एक उठाईगीरे है जो की बहुत प्यारे है ....वैसे भी सारे उठाईगीरे हमको प्यारे ही लगते है नहीं तो भला क्यों हम उनको लाखो गालिया बकने के बाद भी हर ५ साल मे वापस चुन लेते है... हां तो इस उठाईगीरे शिव को एक पटाखे से प्यार हो जाता है...अब इसे प्यार कहे या आकर्षण ...लेकिन हो ही जाता है और वह अपने चित परिचित तरीके से इस पटाखे को पटा भी लेता है...सबकुछ बढ़िया चल रहा है अचानक एक दिन एक प्यारी सी मुनिया आती है और इस उठाईगीरे को पापा पापा पुकारने लगती है....भिया अब ना नुकुर करते करते वो ठग इस बच्ची को अपना लेता है... बाद मे पता चलता है की कुछ गुंडे इस उठाईगीरे के पीछे पड़ गए....क्यों पड़े.....कारण है विक्रम राठोड ..... विक्रम राठोड एक बहादुर पुलिसवाला है और ईमानदार है (इंटरेस्टिंग.....शायद अन्ना हजारे को अच्छा लगे )...इस कारण एक चवन्नी छाप गुंडा जो इतना खतरनाक है की उसकी नाक मे कोई भी नकेल नहीं ड़ाल पा रहा है..विक्रम राठोड ने उसकी नाक मे किल्ले गाड दिए थे....अब इस उठाईगीरे का विक्रम राठोड से क्या सम्बन्ध है, मुनिया उसको पापा क्यों कहती है, पटाखा कहा गय...

garibo ka aasraa

घनी चिलचिलाती धुप मे आज मैंने देखा की एक इंसान जिसके हाथो मे ड्रिप चढ़ी हुई थी....पसीना छु रहा था...नंग धडंग बदन था कमर पर एक पट्टेदार चड्डी अलबत्ता अवश्य थी.... अस्पताल के बाहर एक पान वाले से चिरौरी कर रहा था की मुझे एक बीडी पिला  दो पैसे नहीं है मेरे पास.....उसकी ड्रिप की नलिका मे खून उतर आया था ....पूछने पर पता चला की वह जिला अस्पताल मे भर्ती है और उसके साथ कोई नहीं है....बीडी पिने की तमन्ना हुई तो बाहर चला आया....मैंने उससे पूछा की भैया जब इतने बीमार हो तो अस्पताल से बाहर क्यों आ गए...किसी ने रोका नहीं तुम्हे...तो कहने लगा की मैं बस ऐसे ही कुछ बोलकर  निकल आया की बाहर कुछ काम है ....जब मैंने उससे पूछा की तुम्हारे पास बीडी पिने के पैसे नहीं है तो इलाज का खर्च कौन उठा रहा है...ये ड्रिप के पैसे कहा  से आये...उसने जो मुझे बताया वह वैसा का वैसा ही यहाँ ड़ाल रहा हु.... " बांसवाडा का रहने वाला हु और यहाँ मजूरी करता हु...बीमार पड़ा तो सरकारी दवाखाने दिखाने आया उन लोगो ने भरती कर लिया...सारी दवा अस्पताल से मिल जाती है..ड्रिप भी उन्ही लोगो ने लगाया ...२ दिन से भरती ...

घी का मायाजाल

मुनाफा कमाने के लिए लोग इस हद तक गिर जाते है कि वे दूसरों की जिंदगी ही दांव पर लगा देते है। ऐसे लोगों को केवल पैसों की भूख होती है। लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने वाले ऐसे लोगों को फांसी की सजा मुकर्रर होनी चाहिए। यह कहना है घी बनाने वाली एक फैक्टरी में काम करने वाले युवक का। पंचकूला निवासी इस युवक को जब घी की असलियत पता लगी तो उसने फैक्टरी ही छोड़ दी। यह युवक घी की सुगंध से ही बता देता है कि यह असली है या नकली। युवक का दावा है कि पंचकूला में भी कई जगहों पर नकली घी बिक रहा है। कैसे तैयार होता है नकली घी देशी घी के नाम पर जो नकली घी बाजार में उपलब्ध है, उसमें हड्िडयों का बुरादा मिला होता है। मिली जानकारी के अनुसार शुद्ध घी में हड्डी की चर्बी लगभग बराबर अनुपात में मिलाई जाती है, जिससे वह दानेदार प्रतीत होता है। हड्डी की बदबू खत्म करने के लिए इसमें केमिकल एसेंस डाला जाता है। हड्डी का जो बुरादा डाला जाता है, उसे टेलो कहते है। इसीलिए इस घी के निर्माताओं ने इसे कोड वर्ड 'टेलो घी' का नाम दे रखा है। खास बात यह है कि आम आदमी को इस घी के नकली होने का जरा सा इल्म नहीं हो सकता। टेलो को साबुन ...

दरिन्दे

परसों की ख़बर है की पकिस्तान के पशिमोत्तर प्रान्त मे बुनेर मे एक फूटबालबम से १२ बच्चो की मौत हो गई। एक खेल मैदान मे बच्चो को लावारिस फूटबाल मिली और वो उससे खेलने लगे तभी विस्फोट हुआ और १२ बच्चो की मौत हुई। इस ख़बर को ज्यादा तवज्जो नही मिली क्योकि पकिस्तान मे ऐसे धमाके रोजाना ही होते है और लोग मरते ही रहते है। पर यह ख़बर बहुत ख़ास है। अब तक आतंकवादी बडो को मारते थे, किसी घटना मे अगर बच्चे भी मर जाए तो यह संयोग ही रहता था पर यह घटना यह सिद्ध करती है की अब उनके निशाने पर बच्चे भी है और इन दरिंदो मे मानवता नाम की कोई चीज नही है । तालिबान शुरू से कहते रहे है की खेलो और फिल्मो की या मनोरंजन की इस्लाम मे कोई जगह नही है। आप तो बस दाढ़ी बढाओ और हाथ मे हथ्यार थामो और लोगो को मौत के घाट उतारो। इस घटना ने लोगो को या बच्चो को चेतावनी दी है की अगर खेले तो मौत आ सकती है। तुम खेलो मत पढ़ाई मत करो बस जेहादी बनो। इस घटना का कही कोई प्रतिक्रिया नही आई और सब चुप है पर यह अत्यन्त भयानक और घिनोनी घटना है। पकिस्तान को कार्यवाही करनी छाहिये और अमेरिका क्यो चुप है समझ नही आता। जब तक इन दरिंदो को धर्म के नाम पर...

जूता पुराण

मेरे अपने पहले ब्लॉग जरनैल का जूता मे जरनैल सिंह के जूता फेकने को सही ठहराया था और मई उस पर अभी भी कायम हु। मैंने जो कहा था वह सच हुआ और कांग्रेस ने सज्जन और जगदीश के टिकेट भी काटे परन्तु अब तो जुटा फेकने की बयार आई हुई है। जिसे देखो वही जूता फेक रहा है। जीतेन्द्र, आडवानी, नविन जिंदल और अब प्रधानमन्त्री पात्र जूता फेका जा चुका है। जरनैल के जूता फेकने और बाकि जूता फेकने मे अन्तर है। जरनैल के पास मुद्दा था लेकिन बाकि सिर्फ़ सुर्खिया बटोरने के लिए ये सब कर रहे है। प्रधानमत्री पर जूता फेकना असभ्यता की पराकाष्ठा है। इन लोगो को माफ़ करना इनके होसले बढ़ाने जैसा ही है। प्रधानमंत्री का पद बहुत ही गंभीर और जिमेदार पदहै, इस पड़ पर आसीन व्यक्ति बहुत ही सम्माननीय होते है उनपर जूता फेकना बहुत ही ग़लत और कायराना हरकत है। अब सरकार को सभी जूते फेकने वालो पर कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए ताकि संदेश मिले की झूटे प्रचार पाने का यह तरीका कितना ग़लत है।

द ग्रेट इंडियन पॉलिटिकल मुजरा

चुनाव के पहले दौर के मतदान ख़त्म हो चुका है और दूसरा होने वाला है पर कही भी कोई सुगबुगाहट नजर नही आ रही है । टीवी पर जरुर बुलबुले छूटते रहते है पर वो अपर्याप्त है। कही कोई बहस कोई नुक्कड़ बैठक कुछ नही है। रैली हो रही है पर बहुत सिमित है। वह दौर चला गया लगता है जब प्रत्याशी घर घर जाकर दस्तक देते थे और हाथ जोड़ते फिरते थे । नुक्कड़ नुक्कड़ सभाए होती थी और चोराहे पान ठेले आपसी बहसों से गुलजार होते थे। बच्चे पार्टियों के बिल्ले इकट्ठे करते फिरते थे। अबकी बरी अटल बिहारी या फ़िर चार चवन्नी थाली मे इंदिरा गाँधी दिल्ली मे। अब तो नारे मजमे गायब है। चुनाव आयोग ने ऐसा चाबुक मारा है की सब कुछ सहम गया है। और तो और अब प्रत्याशी भी नजर नही आते है। अब तो प्रत्याशी ज्यादा ही समझदार हो गए है, चुनाव के दोरान ही घरो पर दस्तक नही देते तो जितने के बाद क्या आयेंगे? खैर उन्हें आने की आवशयकता ही क्या है जाए तो भी वोट पड़ेंगे चाहे कम ही पड़े। भारतीय लोकतंत्र मे अगर ३ वोट भी पड़े तो दो वोट पाने वाला विजयी होगा चाहे उस क्षेत्र की जनसँख्या १० लाख ही क्यो न हो। हां तो मई कह रहा था की आजकल नेता गायब है और झंडे डंडे इति...