नया साल नया माल- रावडी राठोड
नया साल नया माल- रावडी राठोड
एक उठाईगीरे है जो की बहुत प्यारे है ....वैसे भी सारे उठाईगीरे हमको प्यारे ही लगते है नहीं तो भला क्यों हम उनको लाखो गालिया बकने के बाद भी हर ५ साल मे वापस चुन लेते है...
हां तो इस उठाईगीरे शिव को एक पटाखे से प्यार हो जाता है...अब इसे प्यार कहे या आकर्षण ...लेकिन हो ही जाता है और वह अपने चित परिचित तरीके से इस पटाखे को पटा भी लेता है...सबकुछ बढ़िया चल रहा है अचानक एक दिन एक प्यारी सी मुनिया आती है और इस उठाईगीरे को पापा पापा पुकारने लगती है....भिया अब ना नुकुर करते करते वो ठग इस बच्ची को अपना लेता है...
बाद मे पता चलता है की कुछ गुंडे इस उठाईगीरे के पीछे पड़ गए....क्यों पड़े.....कारण है विक्रम राठोड .....
विक्रम राठोड एक बहादुर पुलिसवाला है और ईमानदार है (इंटरेस्टिंग.....शायद अन्ना हजारे को अच्छा लगे )...इस कारण एक चवन्नी छाप गुंडा जो इतना खतरनाक है की उसकी नाक मे कोई भी नकेल नहीं ड़ाल पा रहा है..विक्रम राठोड ने उसकी नाक मे किल्ले गाड दिए थे....अब इस उठाईगीरे का विक्रम राठोड से क्या सम्बन्ध है, मुनिया उसको पापा क्यों कहती है, पटाखा कहा गया....चवन्नी छाप गुंडा कैसे डिपार्टमेंट को अपने बस मे रखता है....क्या क्या हुआ...ये सब इस धमाके मे है जिसका नाम है ...रावडी राठोड.....(ज्यादा कहानी बताने से आपको फिलम देखने मे मजा नहीं आएगा...)
मेरा फटका ४४० का झटका...
एकल ठाठिया सिनेमाघर मे मात्र २५ रुपये मे रावडी राठोड देखी ....अद्भुत माहोल था...लकड़ी के फटे पर बीडी के धुवे के बीच जब ढेर सारी सीटियो की गूंज मे अक्षय कुमार गुंडों को मारता है तो कलेजा हलकान होने लगता है ...लगता है की हाँ चलो बढ़िया है....देश को भी कोई रावडी चाहिए...जो जन ठोकपाल ले आये.....
चलो मुद्दे से भटके नहीं और सीधे फिल्म की समीक्षा पर आ जाए.... गाने अच्छे है...केची..अक्षय कुमार ने बड़े दिनों के बाद रंग जमाया...उसके चेहरे से एक साथ मासूमियत के साथ साथ काइयापन भी झलकता है .. ..जब वो ठग होता है तब ठग लगता है और जब पोलिस तब पोलिस....अगर फिल्म मे हीरो दमदार हो तो उसकी टक्कर का विलेन भी होना चाहिए...यहाँ इस फिल्म मे विलेन ...विलेन कम और नुक्कड़ का पान वाला ज्यादा लगता है जो आपसे १० रुपये के कोल्ड्रिंक का १२ रुपया वसूलता है....इस फिल्म मे हिरोइन का कोई स्कोप नहीं था फिर भी सोनाक्षी ने आत्मविश्वास से काम किया है ...वैसे अगर कोई और भी हिरोइन होती तो काम चल जाता ....पूरी फिल्म अक्षय के बूते है...और उसने खूब तरीके से काम किया है....अगर फिल्म देखी तो बुरी नहीं लगेगी...पर इसका असल आनंद मल्टीप्लेक्स मे नहीं ठाठिया मे है.....जरुर देखे......(विशाल पंडित )
एक उठाईगीरे है जो की बहुत प्यारे है ....वैसे भी सारे उठाईगीरे हमको प्यारे ही लगते है नहीं तो भला क्यों हम उनको लाखो गालिया बकने के बाद भी हर ५ साल मे वापस चुन लेते है...
हां तो इस उठाईगीरे शिव को एक पटाखे से प्यार हो जाता है...अब इसे प्यार कहे या आकर्षण ...लेकिन हो ही जाता है और वह अपने चित परिचित तरीके से इस पटाखे को पटा भी लेता है...सबकुछ बढ़िया चल रहा है अचानक एक दिन एक प्यारी सी मुनिया आती है और इस उठाईगीरे को पापा पापा पुकारने लगती है....भिया अब ना नुकुर करते करते वो ठग इस बच्ची को अपना लेता है...
बाद मे पता चलता है की कुछ गुंडे इस उठाईगीरे के पीछे पड़ गए....क्यों पड़े.....कारण है विक्रम राठोड .....
विक्रम राठोड एक बहादुर पुलिसवाला है और ईमानदार है (इंटरेस्टिंग.....शायद अन्ना हजारे को अच्छा लगे )...इस कारण एक चवन्नी छाप गुंडा जो इतना खतरनाक है की उसकी नाक मे कोई भी नकेल नहीं ड़ाल पा रहा है..विक्रम राठोड ने उसकी नाक मे किल्ले गाड दिए थे....अब इस उठाईगीरे का विक्रम राठोड से क्या सम्बन्ध है, मुनिया उसको पापा क्यों कहती है, पटाखा कहा गया....चवन्नी छाप गुंडा कैसे डिपार्टमेंट को अपने बस मे रखता है....क्या क्या हुआ...ये सब इस धमाके मे है जिसका नाम है ...रावडी राठोड.....(ज्यादा कहानी बताने से आपको फिलम देखने मे मजा नहीं आएगा...)
मेरा फटका ४४० का झटका...
एकल ठाठिया सिनेमाघर मे मात्र २५ रुपये मे रावडी राठोड देखी ....अद्भुत माहोल था...लकड़ी के फटे पर बीडी के धुवे के बीच जब ढेर सारी सीटियो की गूंज मे अक्षय कुमार गुंडों को मारता है तो कलेजा हलकान होने लगता है ...लगता है की हाँ चलो बढ़िया है....देश को भी कोई रावडी चाहिए...जो जन ठोकपाल ले आये.....
चलो मुद्दे से भटके नहीं और सीधे फिल्म की समीक्षा पर आ जाए.... गाने अच्छे है...केची..अक्षय कुमार ने बड़े दिनों के बाद रंग जमाया...उसके चेहरे से एक साथ मासूमियत के साथ साथ काइयापन भी झलकता है .. ..जब वो ठग होता है तब ठग लगता है और जब पोलिस तब पोलिस....अगर फिल्म मे हीरो दमदार हो तो उसकी टक्कर का विलेन भी होना चाहिए...यहाँ इस फिल्म मे विलेन ...विलेन कम और नुक्कड़ का पान वाला ज्यादा लगता है जो आपसे १० रुपये के कोल्ड्रिंक का १२ रुपया वसूलता है....इस फिल्म मे हिरोइन का कोई स्कोप नहीं था फिर भी सोनाक्षी ने आत्मविश्वास से काम किया है ...वैसे अगर कोई और भी हिरोइन होती तो काम चल जाता ....पूरी फिल्म अक्षय के बूते है...और उसने खूब तरीके से काम किया है....अगर फिल्म देखी तो बुरी नहीं लगेगी...पर इसका असल आनंद मल्टीप्लेक्स मे नहीं ठाठिया मे है.....जरुर देखे......(विशाल पंडित )
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें