संदेश

अप्रैल, 2009 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

दरिन्दे

परसों की ख़बर है की पकिस्तान के पशिमोत्तर प्रान्त मे बुनेर मे एक फूटबालबम से १२ बच्चो की मौत हो गई। एक खेल मैदान मे बच्चो को लावारिस फूटबाल मिली और वो उससे खेलने लगे तभी विस्फोट हुआ और १२ बच्चो की मौत हुई। इस ख़बर को ज्यादा तवज्जो नही मिली क्योकि पकिस्तान मे ऐसे धमाके रोजाना ही होते है और लोग मरते ही रहते है। पर यह ख़बर बहुत ख़ास है। अब तक आतंकवादी बडो को मारते थे, किसी घटना मे अगर बच्चे भी मर जाए तो यह संयोग ही रहता था पर यह घटना यह सिद्ध करती है की अब उनके निशाने पर बच्चे भी है और इन दरिंदो मे मानवता नाम की कोई चीज नही है । तालिबान शुरू से कहते रहे है की खेलो और फिल्मो की या मनोरंजन की इस्लाम मे कोई जगह नही है। आप तो बस दाढ़ी बढाओ और हाथ मे हथ्यार थामो और लोगो को मौत के घाट उतारो। इस घटना ने लोगो को या बच्चो को चेतावनी दी है की अगर खेले तो मौत आ सकती है। तुम खेलो मत पढ़ाई मत करो बस जेहादी बनो। इस घटना का कही कोई प्रतिक्रिया नही आई और सब चुप है पर यह अत्यन्त भयानक और घिनोनी घटना है। पकिस्तान को कार्यवाही करनी छाहिये और अमेरिका क्यो चुप है समझ नही आता। जब तक इन दरिंदो को धर्म के नाम पर...

जूता पुराण

मेरे अपने पहले ब्लॉग जरनैल का जूता मे जरनैल सिंह के जूता फेकने को सही ठहराया था और मई उस पर अभी भी कायम हु। मैंने जो कहा था वह सच हुआ और कांग्रेस ने सज्जन और जगदीश के टिकेट भी काटे परन्तु अब तो जुटा फेकने की बयार आई हुई है। जिसे देखो वही जूता फेक रहा है। जीतेन्द्र, आडवानी, नविन जिंदल और अब प्रधानमन्त्री पात्र जूता फेका जा चुका है। जरनैल के जूता फेकने और बाकि जूता फेकने मे अन्तर है। जरनैल के पास मुद्दा था लेकिन बाकि सिर्फ़ सुर्खिया बटोरने के लिए ये सब कर रहे है। प्रधानमत्री पर जूता फेकना असभ्यता की पराकाष्ठा है। इन लोगो को माफ़ करना इनके होसले बढ़ाने जैसा ही है। प्रधानमंत्री का पद बहुत ही गंभीर और जिमेदार पदहै, इस पड़ पर आसीन व्यक्ति बहुत ही सम्माननीय होते है उनपर जूता फेकना बहुत ही ग़लत और कायराना हरकत है। अब सरकार को सभी जूते फेकने वालो पर कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए ताकि संदेश मिले की झूटे प्रचार पाने का यह तरीका कितना ग़लत है।

द ग्रेट इंडियन पॉलिटिकल मुजरा

चुनाव के पहले दौर के मतदान ख़त्म हो चुका है और दूसरा होने वाला है पर कही भी कोई सुगबुगाहट नजर नही आ रही है । टीवी पर जरुर बुलबुले छूटते रहते है पर वो अपर्याप्त है। कही कोई बहस कोई नुक्कड़ बैठक कुछ नही है। रैली हो रही है पर बहुत सिमित है। वह दौर चला गया लगता है जब प्रत्याशी घर घर जाकर दस्तक देते थे और हाथ जोड़ते फिरते थे । नुक्कड़ नुक्कड़ सभाए होती थी और चोराहे पान ठेले आपसी बहसों से गुलजार होते थे। बच्चे पार्टियों के बिल्ले इकट्ठे करते फिरते थे। अबकी बरी अटल बिहारी या फ़िर चार चवन्नी थाली मे इंदिरा गाँधी दिल्ली मे। अब तो नारे मजमे गायब है। चुनाव आयोग ने ऐसा चाबुक मारा है की सब कुछ सहम गया है। और तो और अब प्रत्याशी भी नजर नही आते है। अब तो प्रत्याशी ज्यादा ही समझदार हो गए है, चुनाव के दोरान ही घरो पर दस्तक नही देते तो जितने के बाद क्या आयेंगे? खैर उन्हें आने की आवशयकता ही क्या है जाए तो भी वोट पड़ेंगे चाहे कम ही पड़े। भारतीय लोकतंत्र मे अगर ३ वोट भी पड़े तो दो वोट पाने वाला विजयी होगा चाहे उस क्षेत्र की जनसँख्या १० लाख ही क्यो न हो। हां तो मई कह रहा था की आजकल नेता गायब है और झंडे डंडे इति...

जरनैल का जूता

इतिहास गवाह है जब जब जुल्म की इन्तहा होती है तो दबा हुआ गुस्सा बाहर फ़ुट आता है ऐसा ही कुछ दिल्ली मे हुआ जब बहादुर पत्रकार जरनैल सिंह ने चिदंबरम पर जुटा उछाल फेका । यहाँ जो जूता ताई टलर पर पड़ना था उसे सांकेतिक रूप से गृहमंत्री पर मारा गया । यह हमला देश के maanas पर भी है जिसने कम से कम soye हुए लोगो को jhinjhoda तो सही । यह कोई हमला नही आक्रोश की अभिव्यक्ति था । ८४ के दंगो के शिकार अब तक न्याय को तरस रहे है और दंगाई सजा पाने के बजाय मत्री बन रहे है । ये कैसा न्याय है । राजीव गाँधी ने कहा था की जब बड़ा पेड़ गिरता है तो निचे वाले दबेंगे ही ( यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है की राजीव ने यह बात गुजरात के २० वर्ष पहले कही थी , यानि की हम कह सकते है की मोदी परम्पराओ का पालन कर रहे थे ?) BJP ने moka lapak लिया और sikho ने जरनैल को moral support दिया । अब घटना की शव parikshaa हो रही है और हो सकता है congress जरनैल के ...

पद्मश्री

चित्र
बॉलीवुड मे मशहूर है की जो अवार्ड दिए जाते है वो सपोंसर्ड होते है यानि की अगर मेरा सिक्का चलता हो तो कांती शाह टाइप फ़िल्म को भी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का अवार्ड मिल सकता है। अब सरकार भी सरकारी उच्चसम्मानों का मजाक बनाने पर उतर आई है। इस वर्ष दो बड़ी ही सम्मान निय हस्तियों को पद्म अवार्ड दिए है जिन्होंने भारत का सम्मान बढाने के बड़े ही उचे उचे काम किए है. एक हस्ती है श्रीमती ऐश्वर्या रायबच्चन जिन्होंने भारत की अगली मदर टेरेसा बनने के वादे करने के बाद फिल्मो मे काफी कमर मटकाई। देश को नचाने का कामकिया। ये किससे शादी करेगी और किसका दिल तोडेगी इस विषय पर अखबारों पत्रिकाओ के टनों पन्ने काले हुए और प्राइम टाइम पर देश की जनता काबहुत समय जाया हुआ। इन्होने बहुत सी लड़कियों की जिंदगी सपने दिखाने मे बर्बाद की और कई कंपनियों की बिक्री बढाई। कभी कहती ये साबुन आपकी त्वचा को चम्कायेगा कभी कहती ये क्रीम लगाओ जिंदगी बदल जायेगी । पर न तो त्वचा निखरी न जिंदगी बदली, लड़कियों को काम्प्लेक्स जरुर दे दिया। दुसरे महान पद्म श्री है श्रीमंत अक्षय कुमार जो फूहड़ फिल्मो मे काम करते करते पद्मश्री हो गए।...

चुनाव आचार संहिता - चू चू का मुरब्बा

चुनावी मोसम आ आया और चुनावी मेंढक आपने अपने बिलों से बहार आ गए। कल तक जो नेता सूरत दिखाने ५ सालो मे आते थे अब वो इस चुनावी बहार मे गुलजार हो रहे है। जहा देखो ये ही नजर आ रहे है। पहले तो चुनाव आयोग क्या होता है ये लोग नही जानते थे परन्तु श्रीमान शेषन के पदार्पण के बाद सभी जानने लगे है। उनकी लीक पीटने का काम उनके बाद के चुनाव आयुक्त कर रहे है। परन्तु ये चुनाव अचार संहिता अब लगने लगा है की चुचू का मुरब्बा बन कर रह गई है। जहा देखो यही शोर है की फलाने जी को आदर्श चुनाव संहिता या अचार संहिता का उल्लंघन करने पर नोटिस दिया या आपत्ति जताई परन्तु होता कुछ नही । इस बार यह देखने मे आ रहा है की बीजेपी के नेताओ पर ज्यादा अचार संहिता के उल्लंघन के मामले सामने आ रहे है। इससे दो निष्कर्ष निकलते है या तो वास्तव मे बीजेपी के लोग कानून नही मानते या उन्हें जबरदस्ती बलि का बकरा बनाया जा रहा है। दुसरे मामलो का तो नही कह सकता पर जसवंत सिंह वाले मामले मे लगता है की अचार संहिता चुचू का मुरब्बा हो रही है। बड़ा रोचक मामला है जसवंत सिंह को ढोल वाले को पैसे देने के आरोप मे नोटिस। इस मामले की जांच चुनाव आयोग के आदेश...