द ग्रेट इंडियन पॉलिटिकल मुजरा

चुनाव के पहले दौर के मतदान ख़त्म हो चुका है और दूसरा होने वाला है पर कही भी कोई सुगबुगाहट नजर नही आ रही है । टीवी पर जरुर बुलबुले छूटते रहते है पर वो अपर्याप्त है। कही कोई बहस कोई नुक्कड़ बैठक कुछ नही है। रैली हो रही है पर बहुत सिमित है। वह दौर चला गया लगता है जब प्रत्याशी घर घर जाकर दस्तक देते थे और हाथ जोड़ते फिरते थे । नुक्कड़ नुक्कड़ सभाए होती थी और चोराहे पान ठेले आपसी बहसों से गुलजार होते थे। बच्चे पार्टियों के बिल्ले इकट्ठे करते फिरते थे। अबकी बरी अटल बिहारी या फ़िर चार चवन्नी थाली मे इंदिरा गाँधी दिल्ली मे। अब तो नारे मजमे गायब है।
चुनाव आयोग ने ऐसा चाबुक मारा है की सब कुछ सहम गया है। और तो और अब प्रत्याशी भी नजर नही आते है। अब तो प्रत्याशी ज्यादा ही समझदार हो गए है, चुनाव के दोरान ही घरो पर दस्तक नही देते तो जितने के बाद क्या आयेंगे? खैर उन्हें आने की आवशयकता ही क्या है जाए तो भी वोट पड़ेंगे चाहे कम ही पड़े। भारतीय लोकतंत्र मे अगर ३ वोट भी पड़े तो दो वोट पाने वाला विजयी होगा चाहे उस क्षेत्र की जनसँख्या १० लाख ही क्यो न हो।
हां तो मई कह रहा था की आजकल नेता गायब है और झंडे डंडे इतिहास की बात हो गए है। कुछ प्रत्याशी जरुर अखबार मे विज्ञापन दे देते है ताकि जनता को पता तो चले की फलाने महाशय यहाँ से फलानी पार्टी से उम्मीदवार है। और अगर विज्ञापन ना भी दे तो जिस दिन वोट देने जाए उस दिन इ वि एम् पर तो लिखा ही होगा सो खर्च क्यो किया जाए। तो भइया खर्च मत करो और लाखो का खर्च दिखा दो हो गई काली कमाई सफ़ेद ।
सो यह चुनाव ग्रेट इंडियन पॉलिटिकल मुजरे मे बदलते जा रहे है और यह परिणाम घोषित होने के बाद पुरे शबाब पर पहुच जायेगा क्योकि बहुमत किसी को नही मिलने वाला है और हो सकता है की दो बिल्लियों की लड़ाई मे कोई बन्दर रोटी ले भागे (लालूजी सुन रहे हो न )।

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